<h2>ख़ुरआन और हदीस का चमत्कार</h2>
<h3 id='1'>पवित्र ख़ुरआन के चमत्कार्य होने के कारण</h3>
<p>हर रसूल के लिए कुछ निशानियाँ होती हैं, जो उसके सच्चे नबी और रसूल होने का
प्रमाण है। उदाहरण के रूप में मूसा कि निशानी उनकी लाठी थी। ईसा की निशानी यह थी
कि वह जन्मांध, कोड़ी को स्वस्थ करदेते थे, और मृत्यु को ईशवर के आदेश से जीवित
करदेते थे। नबी और रसूलों के समापक (मुहम्मद) कि निशानी, मानवता के शेष रहने तक
हर समय और स्थान के लिए उपयुक्त होने के अनुसार यह ख़ुरआन है। ख़रआन मार्गदर्शक
पुस्तक है, इसी प्रकार से वह हर विषय में चमत्कार है। ख़ुरआन का चमत्कार होना पूर्वकाल
से लेकर आज तक उसके सन्देश, और रसूल के सच्चे होने का सबूत है। इसी तरह इस बात
का भी प्रमाण है कि यह पुस्तक प्रजापति अमर प्रभु की ओर से अवतरित की गयी है। इसको
नबी और रसूलों के साथ भेजा गया है, जो हर समय और स्थान के लिये उपयुक्त है। उपयुक्त
जिन कारणों का विवरण किया गया, इसके साथ-साथ ख़ुरआन का चमत्कार यह भी है कि वह
अपनी वैज्ञानिक सूचनाओं में भी अद्भुत है। जैसा कि प्रकृतिक ज्ञान के रहस्य के
प्रति ख़ुरआन कि विवरण की हुई बातों मे समाकालिन शोधकर्ता के प्रयासों से मालूम
होता है। जब कि इस प्रकृतिक ज्ञान की खोज वर्तमान काल में ही हुई है। उदाहरण के
रूप में मानव की सृष्टी और भ्रूण के प्रति संपूर्ण रूप से मानवता को ज्ञान प्राप्त
होने से कई वर्षों पहले विवरण हुआ है। ईशवर ने कहा। <strong>हमने मनुष्य को मिट्टी
के सत से बनाया। फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बूँद बनाकर रखा।
फिर हमने उस बूँद को लोथड़े का रूप दिया, फिर हमने उस लोथडे को बोटी का रूप दिया,
फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाई, फिर हमने उन हड्डियों पर माँस चढ़ाया, फिर हमने
उसे एक दूसरा ही सृजन रूप देकर खड़ा किया। अतः बहुत ही बरकतवाला है अल्लाह, सब
से उत्तम स्पष्टा । </strong><small>(अल-मोमिनून, 12-14)</small></p>
<div class="shahed">
<h4>प्रोफ़ेसर यो शेवदी कोज़ान</h4>
<h5>टोकियोवैद्यशाला का डैरेक्टर</h5>
<h6>भ्रूण का विवरण</h6>
<span>मुझे इस बात को स्वीकार करने में दुविधा नही होती है कि ख़ुरआन ईशवर की वाणी
है। क्यों कि ख़ुरआन ने भ्रूण के बारे में जो विवरण किया है, उनको सात्वीं सदी
कि विज्ञानिक खोज पर आधारित करना संभव नही है। एक ही उचित परिणाम यह है कि ये विवरण
ईशवर द्वारा मुहम्मद की ओर वह्यी (रहस्योद्घाटन) हुई हैं।</span></div>
<p>ईशवर ने कहा। <strong>वह तुम्हारी माँओं के पेटों में तीन अँधेरों के भीतर तुम्हें
एक सृजन रूप के पश्चात अन्य एक सृजनरूप देता चला जाता है। वही अल्लाह तुम्हारा
रब है। बादशाही उसी की है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नही। फिर तुम कहाँ फिर
जाते हो। </strong><small>(अल-ज़ुमर, 6)</small></p>
<p>जब वैद्य (डॉक्टर) अपने संदर्भों और खोज की ओर देखें, तो बिल्कुल उसी प्रकार
पाया, जिस प्रकार कि ख़बर रखने वाला ज्ञाता ईशवर ने विवरण किया। इसके साथ साथ ख़ुरआन
ने शरीर में ज्ञानेन्द्रिय स्थान का वर्णन किया। ईशवर ने कहा। <strong>जिन लोगों
ने हमारी आयतों का इनकार किया उन्हे हम जल्द ही आग में झोंकेंगे। जब भी उनकी खाले
जाएँगी तो हम उन्हे दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे, ताकि वे यातना का मज़ा चखते
ही रहें। निस्संदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्तवदर्शी है। </strong><small>(अल-निसा,
56)</small></p>
<p>ख़ुरआन ने आकाश को विशाल होने का वर्णन किया। ईशवर ने कहा। <strong>आकाश को
हमने अपने हाथ के बल से बनाया और हम बड़ी समाई रखनेवाले हैं। </strong><small>(अल-ज़ारियात,
47)</small></p>
<p>सूर्य को अपने ठिकाने में चलते रहने का ख़ुरआन में विवरण हुआ है। ईशवर ने कहा।
<strong>और एक निशानी उनके लिए रात है। हम उसपर से दिन को खींच लेते हैं। फिर क्या
देखते हैं कि वे अंधेरे में रह गये। और सूर्य अपने नियत ठिकाने के लिए चला जा रहा
है। यह बाँधा हुआ हिसाब है प्रभुत्वशाली, ज्ञानवान का। </strong><small>(या-सीन,
37-38)</small></p>
<h3 id='2'>हदीस (रसूल की वाणी) के चमत्कार्य होने के कारण</h3>
<p>रसूल की वाणी (हदीस) भी इस चमत्कार से कुछ दूर नही है। माँ आइशा कहती है कि
रसूल ने कहाः आदम की संतान के हर मानव कि 360 जोड़ों पर सृष्टी हुई है। जिसने ईशवर
की महत्ता की, प्रशंसा की, ईशवर के एक होने की गवाही दी। ईशवर कि कृतज्ञता की,
उससे मुक्ती चाही, रास्ते से पत्थार, काँटा या हड्डी हटायी, अच्छाई का आदेश दिया
या बुराई से रोका । (ईशवर के रसूल ने इसी प्रकार से 360 जोड़ों की संख्या बतायी)
तो वह उस दिन स्वयं को नरक से दूर करलिया। (इस हदीस को इमाम मुस्लिम ने वर्णन किया
है) </p>
<p>वैज्ञानिक रूप से यह बात प्रमाणित है कि मानवीय शरीर में इन जोडों के बिना मानव
के लिए सांसारिक जीवन से प्रसन्न होना संभव नही है। न धरती में अपने उत्तरधिकार
होने के कर्तव्य वह पूरा कर सकता है। इसी कराण मनुष्य पर यह अधिरोपण है कि वह हर
दिन ईशवर की इस अनुग्रह का आभारी रहे, जो जीव के हर विषय में उसकी महान कला का
प्रमाण है। रसूल की इस वाणी में अद्भुत बात यह है कि आपने ऐसे समय में मानवीय शरीर
के जोड़ों की संख्या का विवरण किया, जबकि किसी को इसके बारे में थोडासा ज्ञान भी
प्राप्त नही था। और आज कि इक्कीसवीं शताब्दी में भी अधिकतर लोग नही जानते। बल्कि
कई वैद्य शिक्षक भी इस बात से अज्ञानी है। यहाँ तक कि कुछ समय पहले मानवीय शरीर
के जोड़ों की संख्या बिल्कुल उसी समान बतायी गयी, जिस समान के मुहम्मद ने चौदाह
सौ वर्ष पहले बताया था। इनमे से 147 जोड़ रीढ़ की हड्डी में 24 जोड़ छाती में,
86 जोड़ शरीर के ऊपरी आधे भाग में, 88 जोड़ शरीर के निचले आधे भाग मे और 15 जोड़
कमर मे हैं।</p>
<h3 id='3'>इस निरक्षर नबी को किसने शिक्षा दी</h3>
<div class="shahed">
<h4>हेन्री डीकॉस्ट्री</h4>
<h5>फ्रेंच सेना का पूर्व कर्नल</h5>
<h6>अनपढ रसूलकन पत्रकार</h6>
<span>निस्संदेह बुद्धी इस विषय से परेशान रहजाती है कि एक अनपढ व्यक्ति से कैसे
ख़ुरआन की यह आयतें (वाक्य) निकालना संभव है। पश्चिम के सारे लोगों ने यह माना
है कि यह सारे वाक्य ऐसे हैं, जिन के शब्द और अर्थ के समान मानवीय बुद्धी लाने
से असहाय है।</span></div>
<p>स्वयं यह प्रश्न उठता हैः प्रजापति ईशवर के अतिरिक्त कौन है जिसने नबी और रसूलों
के समापक मुहम्मद को यह विशेष वैज्ञानिक ज्ञान कि शिक्षा दी, जिसको मानवीय ज्ञान
ने अभी बीसवीं शताब्दी के अंत में प्राप्त किया है। </p>
<p>कौन है जिसने मुहम्मद मुस्तफा को इस जैसी अनदेखी चीज़ों कि ओर बुलाया। अगर ईशवर
को अपने महान ज्ञान के द्वारा यह पता न होता कि किसी न किसी दिन मानव शारीरिक तथ्य
तक पहुँच जायेगा। तो रसूल की इस वाणी में स्थिर प्रकाशवान इस समापक रसूल कि ईश
देवत्व का सत्य प्रमाण है। इसी प्रकार रसूल के आकाशीय प्रकाशन से सच्चे जोड़ का
सबूत है।</p>
<div class="shahed">
<h4>डिपोरा पूटर</h4>
<h5>अमेरिकन पत्रकार</h5>
<h6>ब्रह्माण्ड के चमत्कार</h6>
<span>अनपढ़ मुहम्मद (जिनका पालन पोषण अज्ञानी सभ्यता में हुआ है) से कैसे संभव
हुआ कि वह ब्रह्माण्ड के उन चमत्कारों का परिचय कराये, जिनका ख़ुरआन में वर्णन
किया है, और जिन कि आधुनिक ज्ञान आज तक खोज में लगा हुआ है। फ़िर तो आवश्यक यह
बात है कि ख़ुरआन देवत्व वाणी है।</span></div>
<p>जब तक ज्ञान और सभ्यता का मार्ग उच्च चरित्र और नैतिकता की ओर ले जानेवाला न
हो, तो वह सभ्यता विनाश करनेवाली है, और वह ज्ञान अप्रसन्नता और नष्ट का कारण है,
ना कि मानवता की सेवा और उन्हें प्रसन्न बनाने का कराण। इसी कारण ज्ञान और सभ्यता
का मार्ग ही नैतिकता का मार्ग भी है। जिस प्रकार ज्ञान और सभ्यता के बिना नैतिकता
का मार्ग केवल एक मिथक और ख़्याल है, इसी प्रकार नैतिकता के बिना सभ्यता और ज्ञान
का मार्ग प्रत्येक व्यक्ति, समाज, समूह और मानवता के लिए विनाशक है।</p>